करीब शाम के छह बज रहे थे धीरे-धीरे अँधेरा छाने लगा था मौसम मे थोड़ी ठंडक थी हवा बिलकुल थमी हुई थी मैं यमुना नदी के किनारे बैठा हुआ था ना जाने क्यों आज आसमां मे ना तारे थे ना चाँद था ना ही पेड़ कि शाखा का एक भी पत्ता हिल रहा था यह शहर का दूसरा हिस्सा था जहाँ शांत वातावरण था पुल की लाइटे नदी मे प्रतिबिंबत हो रही थी दूर जंगल मे लाइटे नजर आ रही थी जो सड़क किनारे लगी हुई थी सड़क तो नहीं लेकिन लाइटो के जरिए एक रास्ता दिखाई दे रहा था जो कही दूर जा रहा था


सननाटा पसरा है यहाँ दूर तक कोई और यहाँ ना नजर आता हैं सिर्फ और सिर्फ मैं ही यहाँ खुद को नजर आता हूँ अब मैं उठ खड़ा हुआ था और यमुना नदी के किनारे टहल रहा था बस इस मंजर को गौर से देख रहा था देखते ही देखते मेरी नजर इस नदी कि हकीकत पर पड़ी जो अब नदी नहीं रह गयी हैं यमुना गंगा नदी कि सबसे बड़ी सहायक नदी हैं जो यमुनोत्री नामक जगह से निकलती हैं और प्रयाग मे गंगा मे मिल जाती हैं

मन ही मन एक विचार आया और सोचा कि अब तो नदी भी रोती होगी और कहती होगी- एक जमाना था जब मेरा पानी भी साफ़ था सांस लेती थी मछलियाँ इसमें, पक्षी उड़ते थे ऊपर मेरे हंस पीते थे पानी मेरा,खुश होकर बहती थी मैं एक लय मे, कुछ ऐसा हाल था मेरा अब तो बदहाल हो चुकी हूँ मै, इन लोगों ने अपने मतलब के लिए मेरा हाल बिगाड़ा हैं कहाँ इतना विशाल रूप था मेरा अब तो खत्म होने कि कगार पर आ चुकी हूँ मैं,कितनो की प्यास बुझाई है मैंने कितनो कि जान बचाई है मैंने, अब तो कोई यूही पीले पानी मेरा तो जिन्दा रहना दुस्वार है उसका | यही हाल रहा है मेरा तो विलुप्त होते देर नहीं लगेगी मुझको सिर्फ किताबो मे पढ़ा  जायेगा मुझको वो दिन दूर नहीं एक नदी थी जिसने कई शहरो  के लोगो की प्यास बुझाई थी और जो लोगो की करामातों की वजह से अब नहीं रही |

बस यही सब घूमते-घूमते सोच रहा था नदी के किनारे, ठहरा हुआ यमुना का पानी कुछ खामोश लम्हे वक्त रुक सा गया था इस जगह , बहुत ही खूबसूरत लम्हा था यह शायद ही ऐसा मौका दोबारा आए मैं इस नदी के इतना करीब आ पाऊ,अँधेरा काफी हो गया था समय भी बहुत हो गया था पता नहीं चला इतना वक्त कैसे हो गया इसके पास , अब मैं उठ खड़ा हो हुआ घर जाने के लिए मन नहीं था घर जाने का पर घर भी जाना था अब मैं उठ कर अपने घर की तरफ चल दिया जैसे ही वहाँ से निकलकर शहर मे आया तो वही शोर-शराबा था हर किसी को जल्दी थी भीड़ भी बहुत थी शोर भी बहुत था फुरसत न थी किसी को बस यही शहर का हाल था मन कर रहा था वही लौट जाऊ लेकिन मज़बूरी थी घर भी आना था


अफ़सोस करोगे विलुप्त होने के बाद मेरा
जब ना होगा पीने को पानी पास तुम्हारे
याद आएगी तब मेरी तुम्हें
तब कोई चारा न होगा अफ़सोस के सिवा 



    आज फिर एक नए सफर पर निकला हूँ  अपने ही शहर मे कुछ नया करने निकला हूँ दोपहर का वक्त था कड़ी धूप मे सड़क के किनारे फुटपाथ पर मैं चल रहा था चलता ही चलता जा रहा था और चलते-चलते मैं एक बाजार मे पहुंच गया मुझे अब भूख भी तेजी से लगने लग गयी थी मैंने सोचा क्यों न अब कुछ खाया तो मैं खाने के लिए एक ठेले कि तरफ बड़ा वहाँ पहुँच कर मैंने जब अपनी जेब से पैसे निकाले तो सिर्फ दस रुपये मेरे पास थे जोकि मेरे घर आने का किराया था मैंने दस रूपए को वापस अपनी जेब मे रख लिया और वहाँ से चल दिया, धूप  तेज थी इसलिए मुझे अब प्यास भी लगने लग गयी थी मैंने अपने आस-पास देखा तो मुझे कुछ ना दिखाई दिया थोड़ा आगे चला तो मुझे एक नल दिखाई दिया मैं दौड़ कर वह पहुँचा तो वो सूखा पड़ा था मैं आगे चलने  लग गया, अब मुझे भूख और प्यास बड़ी तेजी से लग रही थी अब मुझ से बिलकुल चला भी नहीं जा रहा था तो मैंने सोचा की अभी एक पानी की बोतल खरीद लेता हूँ वाकि बाद मे घर जाने की सोचेंगे कि कैसे घर जायेंगे, एक दुकान पर गया वहाँ मैंने पानी की बोतल माँगी तो उसने उसका दाम बीस रूपये बताया और मेरे पास  सिर्फ दस रूपये थे उस दुकान  से निराश होकर मैं एक सुनसान  पड़े बस स्टॉप पर बैठ गया |

चेहरा मेरा धूप मे चलके लाल हो गया था प्यास से मुँह सूख गया था निराशा मेरे चेहरे पर मेरे साफ़ छलक रही थी इधर-उधर मैं देख ही रहा था  तभी एक शख्स साइकिल से उतर कर बस स्टॉप पर आके बैठ गया और अपने थैले से पानी की बोतल निकालकर पानी पीने लगा,पीने के बाद उसने तो टक मेरी तरफ देखा और पूछा बेटा पानी पीयोगे और मैंने झट से हाँ कर दिया पानी पीने के बाद मुझे ऐसा लग रहा था मानो मुझे किसी ने मरने से बचा लिया हो मैंने उन्हें अपना हाल बयां किया कि इतने बड़े शहर मे मुझे मुफ्त पानी ना मिला, इतने बड़े नेता उद्योगपति सब रहते है इस शहर मे क्या यह किसी सड़क के चौराहे पर एक पानी का नल नहीं लगा सकते |
तो उन्होने कहा की शहर मे भरपूर पानी सिर्फ मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे के बाहर मिलेगा और कही नहीं  | अमीरों के यहाँ पानी की नदिया वहती हैं गरीब की बस्ती सुखी रहती हैं देश मे गरीब तो चुनाव के समय मे नेताओ के लिए फरिस्ता बन जाता हैं पर उसके बाद उसका हाल बदहाल हो जाता हैं ना उसका आशियाना बचता हैं न रोजगार, दर-बदर की ठोकरे खाकर उसे कुछ ना सूझता हैं आखरी रास्ता उसे सिर्फ खुदकुशी का दिखता हैं अगले दिन अख़बार के एक कोने मे एक खबर छपती हैं उसकी खबर उसके परिवार को मिलती हैं घर का मुखिया ही कह गया अलविदा यह सुन परिवार की दुर्दशा  होती है उसके साथ कुछ और मौते होती हैं यही खत्म गरीब के परिवार की कहानी होती हैं

 वो शख्स यह सब कह कर चला गया मैं वही बैठा रह गया और सोचने लगा इतने बड़े शहर मे यह हाल हैं गरीब परिवार का | ऊँची इमारतो मे रहते धनवान लोग हैं गाड़िया रोडो पर सरपट दौड़ती हैं एक तरफ ऐसा शहर हैं दूसरी तरफ किसी के परिवार मे खाने तक को नहीं हैं और रोडो पर सो रहे है उनके सपने तो छोड़ो उन्हें चिंता इस बात की है की आज शाम का खाना मिलेगा या नहीं | यह हाल इस दिल्ली शहर का , यह सब सोचते सोचते मैं बस मे चढ़  गया  और अपने घर आ गया उस अनजान शख्स की वजह से ही मैं आज अपने घर सही-सलामत पहुंच पाया हूँ वो भी एक गरीब था जो मेरी जान बचा कर चला गया , इस खूबसूरत शहर  की सच्चाई को आज जान पाया जितना बाहर से यह खूबसूरत देखता उतनी बदसूरती इसके अंदर देख पाया घर पहुंच कर कुछ लाइन  अपनी डायरी मे लिखी तो इसे और गौर से जान पाया

"शहर भी दो हिस्से बट गया है इमारतें अमीरों  और झुग्गियाँ गरीबों की पहचान बन गयी हैं 
इमारतों  मे जश्न सारी रात हुआ गरीब की झोपडी मे उजाला भी ना हुआ, 
ना जाने झोपड़ियों मे कितने भूखे पेट सो गए हैं बर्बाद हुआ है खाना इनके यहाँ "



यह कहानी नहीं हकीकत हैं जो तुमको आज बतानी हैं एक दिन मैं अन्जानो की तरह सड़क के किनारे घूम रहा था शाम का वक्त था शहर की सड़क थी ट्रैफिक का बुरा हाल था मैं चलता जा रहा था आज से पहले मैंने इस सड़क को गौर से नहीं देखा था आज दो पल ठहर के देखा तो कुछ नया जाना, एक सड़क थी उस पर अमीर  गरीब हिंदू मुस्लिम सब एक साथ सफर कर रहे थे मुझे यह मंजर देख के थोड़ा आश्चर्य हुआ |

यह सब देख कर मैंने खुद से मन ही मन एक सवाल किया क्या यह वही लोग हैं जो हर रोज मंदिर-मस्जिद पर लड़ते हैं क्या यही वही लोग है जो हिन्दू मुस्लिम पर बबाल करते हैं अगर यह वही है तो आज इतने शांत क्यों हैं और एक दूसरे के साथ सफर क्यों कर रहे हैं न इन्हे मंदिर की फिक्र है न मस्जिद हैं एक बस मे एक दूसरे के सामने बैठकर सफर कर रहे हैं और एक दूसरे के किस्से कहनियाँ सुन रहे हैं जब एक साथ एक बस मे यह सब सफर कर सकते हैं तो सभी धर्म एक साथ एक राह पर क्यों नहीं चल सकते हैं सड़क किनारे बैठ कर यह सब सोच ही रहा  था तभी एक अनजान शख्स पास आकर बैठा और बोला की किस उलझन मे इस सड़क पर बैठा,मैंने  यह दास्ता उन्हें सुनाई तो उन्होने कुछ न कहा  मुस्कुरा दिए, कुछ  देर बाद बोले यह शिक्षित लोगों की करामात हैं बटवारा जिन्होंने कराया  वो भी शिक्षित थे जो धर्म का बटवारा करा रहे हैं वे भी शिक्षित हैं  अनपढ़ो ने तो हमें साथ रहना सिखाया था हम तो अंधे हैं जिस तरफ  हवा का  रुख होता हैं उस तरफ मुड़ जाते हैं न सोचते हैं न समझते बस जो दूसरे बोलते हैं वो कर देते हैं वो शख्स वहाँ से अपने रास्ते चल दिया और मैं भी अपने रास्ते आ गया | घर लौट कर बस एक लाइन अपनी डायरी मे लिखी   " तुम हमारी दिवाली मे शरीक हो जाओ,हम तुम्हारी ईद मे भाईजान बन जाएं "

        

 एक नया सफर फिर एक बार ना कोई चाहत ना कोई मंजिल बस सफर का मजा | आज फिर एक नए सफर पर निकला हूँ खुद को जानने के लिए हर बार निकलता हूँ आज खुद को तराशने निकला हूँ कुछ नया देखना चाहता हूँ कुछ नया करना चाहता हूँ,शाम का वक्त था बिना मंजिल तय करे घर से निकला था मैं चल रहा था बस चलता ही जा रहा था आँखे मे ना कोई मंजिल थी ना कोई सपना था जो हो रहा था वो एक सपना था और वही मेरा सपना था अँधेरा होने वाला था लगभग हो ही चूका था शहर की  सभी बत्तियाँ जल चुकी थीऔर पूरा शहर रोशनी मे नहा गया था अब सडको पर गाड़िया नहीं सिर्फ उनकी लाइटे नजर आ रही थी इस शहर मे लोगो से ज्यादा सड़कों पर गाड़ियां नजर आती हैं

 शाम होते ही इस शहर मे अफरा तफरी शुरू हो जाती हैं सुबह जो लोग अपने घर से काम के लिए निकले थे वो  शाम होते-होते बुरी तरह थक चुके हैं अब सब को अपने-अपने घर पहुँचने की जल्दी हैं किसी को घर जाके अपने बच्चे के साथ तो किसी को अपने माता-पिता के साथ वक्त बिताना हैं हर कोई जल्दी से बस अपने घर पहुंचना चाहता हैं किसी कोई फिल्म देखनी हैं तो किसी घर जाके जल्दी से सोना हैं बस सबको घर पहुँचना हैं हर किसी को पता हैं कि क्या करना घर जाके, 
शाम के वक्त मेट्रो से लेके बसों तक,हर तरफ बस लोग ही लोग दिखाई  दे रहे थे  सड़को पर बसें,गाड़िया दौड़ती नहीं सिर्फ रेंगती दिखाई देती हैं

 कुछ ऐसा होता हैं शाम के वक्त इस शहर का मंजर | रात होते हुए भी दिन सा नजर आता हैं वक्त ज्यादा हो गया था और मेरे घर से भी फोन आ गया था मैंने एक बात गौर करी हैं अगर मैं घर पहुंचने मे थोड़ा सा लेट हो जाऊ तो उस वक्त कोई याद करे न करे  लेकिन एक बार  हमारे घर वाले हमें जरूर याद कर लेते हैं  शाम होते ही इस शहर के हर चौराहे पर दुकानें सज जाती हैं जिन पर यारों की महफिले भी लग जाती है 

 शाम होते-होते शहर मे शोर शराबा और बढ़ जाता है कुछ ऐसा होता हैं हर शाम इस शहर का मंजर, शाम होते-होते शहर के हालात रंग,रूप  सब कुछ बदल जाता हैं शहर की रोशनी मे आकाश मे तारे जरा कम टिमटिमाते हैं यह तो शहर के सिर्फ एक इलाके का मंजर था अभी तो पुरे शहर की शामे जानना वाकी हैं हर गली के चौराहे पर यारों की महफिले सजती है जिनमें ज्यादा दर स्कूल और कॉलेज जाने वाले यार होते हैं 

जो शामों को कोचिंग पढ़ाई जाती हैं हर एक टुअशन मे कुछ दीवाने होते हैं जो टुअशन ख़त्म होने के बाद एक चौराहे पर खड़े हो जाते हैं जहाँ से वो गुज़रती है उनमे ज्यादा तर मासूम दीवाने होते हैं कुछ का प्यार वर्षों का तो कुछ का महीनों का होता हैं जिनमें कुछ का मुकम्बल हो जाता हैं और कुछ का नहीं होता, जिनका प्यार मुकम्बल हो जाता हैं उनकी उसमे कोई चाहत नहीं होती बस मासूमियत होती हैं जिनका नहीं होता वो उसी की आस मे दोबारा वही खड़े मिलते हैं जब वो निकलती हैं तो उसे देखकर बस मुस्करा देते हैं और वो फिर बिन मुस्कुरयें चली जाती हैं वो मासूम लड़का इसी आस मे अपने घर लौटता है कि वो एक दिन जरूर मुस्कुरा देगी | कुछ ऐसा होता हैं इस शहर की आहट का मंजर, हालांकि आज मैंने पुरे शहर की शाम को नहीं जाना ,लेकिन जितना जाना वो सब नया था यह सब  पुराना था लेकिन गौर मैंने पहली बार दिया था इस शहर की  शाम को  थोड़ा और करीब से जाना है अभी तो सिर्फ थोड़ा जाना है बहुत कुछ जानना वाकी हैं बिन मंजिल तय करे निकला था घर से  उसी का असर था  अब हर कुछ नया जानने मे रूचि बढ़ गयी हैं अब मुसाफिर बनने की ललक लग चुकी हैं फिर अपने शहर मे कुछ नया जानेंगे,कुछ नया पहचानेगे | फिर मिलेंगे एक अनोखे सफर मे || 

यह वह शहर हैं 
जहाँ ना रात होती हैं ना दिन ढलता हैं 
यहाँ दिनों से ज्यादा रातों मे हलचल  होती हैं 
सुनसान सडके अब कम ही नजर आती हैं 
हर चौराहे पर महफिले नज़र आती हैं 
इस भीड़ मे अपना-पन से लगने लगा हैं 
यह ना हो तो शहर मे मातम सा नजर आता हैं
लाइनों मे लगना,किसी अनजान से बात शुरू हो जाना 
इन सब कि अब आदत सी हो गयी हैं 


             अनजान शहर मे फिर अनजानो की तरह निकला हूँ अकेला हूँ सफर पर फिर भी ना कोई गम हैं जी रहा हूँ हर पल को खुल के बस इसी बात का सुकून हैं राहे नई हैं आसमां नया हैं सब कुछ नया और अलग सा हैं एक नई सुबह के साथ एक नए सफर पर निकला हूँ
शहर पुराना हैं बस सदियों से यूही खड़ा हैं ना कुछ कहता हैं ना कुछ बताता हैं बस चुप चाप अपना तमाशा देखता रहता हैं सुबह का वक्त था मैं बस यूही घर से सुबह की सैर पर निकला था शहर वही थी जो आज भी अपनी सियासत के लिए जाना जाता हैं यह कोई और शहर नहीं वल्कि मुगलों  का शहर शाहजहानाबाद हैं मैं यूही सड़क के किनारे फुटपाथ पर चल रहा था मैं नहीं जानता था की मैं कहाँ जा रहा हूँ बस चलता चला जा रहा था कुछ देर यूही चलते रहने के बाद मैं एक पुल पर पहुँच गया, जो अभी बन रहा था और यह अभी वाहनों के लिए बंद था इसलिए इस पर सननाटा पसरा था  मैं धीरे-धीरे आगे चलता गया,तो मैंने देखा कि यह पुल आधा बंद था और आधा खुला हुआ था लेकिन यह खाली पड़ा था यह कोई और नहीं सिगनेचर ब्रिज हैं जो दिल्ली मे यमुना नदी पर बन रहा हैं यह लगभग पूरा हो चूका है इस पर मैं अकेला घूम रहा था दूर तक मैंने देखा तो कोई नहीं थी मैं बस अकेला था बारिश का वक्त था इसलिए हवा ठंडी चल रही थी यमुना नदी इस समय नदी लग रही थी क्यूकी नदी मे इस  वक्त  पानी बढ़ गया हैं ठंडी हवा थी शांत वातावरण था नदी अपनी लय मे वह रही थी खुशनुमा मौसम था अकेला खड़ा था एक अजीब सी कश्मकश थी इतने बड़े शहर मे,मैं अकेला था जो इस पल को जी रहा था वरना यह शहर तो अभी सो कर भी नहीं उठा था कुछ ही देर बाद एक देवता ने दस्तक थी जिसे हम सूर्य देवता कहकर पुकारते हैं सूर्य ने अपने आने का अहसास पुरे शहर को कराया और पुरे शहर को अपने रंग मे कर दिया,सूर्य के पहली किरण जब नदी पर पढ़कर प्रतिबिंबत हुई तो नदी का जल भी  उसी के रंग मे रंग गया, यह बहुत ही यादगार सूर्योदय था इस शहर मे, जो शायद मुझे नसीब हुआ | फिर सफर मे नई मुलाकात होगी नए शहर मे फिर मुलाकात होगी, तब तक के लिए अलविदा || 

फिर देखा उसका नया रूप उसके शोर-शराबे से दूर,

खड़ा था एक मोड़ पर जब पड़ी एक किरण मुख पर
शहर रंग गया उसके रंग मे जब दी उसने दस्तक,

शहर वही था रूप नया था
मधमस्त मौसम मे शांत मैं था,

नदी के साज पर आसमां चल रहा था 
प्रकर्ति अपना गीत गुनगुना रही थी,

 शाहजहानाबाद मे कुछ नया हो रहा था  
मैं इसे नए  रंग मे देख रहा था  | | 




गुरुद्वारा के सामने पार्क 
     आज का  सफर कुछ अलग और अनोखा हैं अनजान सफर मे अनजान मुसाफिर हूँ आज फिर अनजानो की तरह अनजान शहर मे निकला हूँ इस शहर के अभी सिर्फ एक किस्से से ही वाकिफ हुआ हूँ शाम का वक्त था जानी-पहचानी राहे थी अनजाने मे निकला था कुछ पल के लिए, चलता रहा बिन पूछे बिन  बताये और पहुँच गया एक गुरूद्वारे मे | पहले भी बहुत बार आया हूँ मैं यहाँ , मैं सिर्फ एक बार ही गया हूँ इसके अंदर, जिसकी तलाश मे मैं यहाँ आता हूँ वो मुझे यहाँ  पहुँचते ही मिल जाती हैं
गुरूद्वारे के साथ बहती यमुना नदी 
जिस गुरूद्वारे की मैं बात कर रहा हूँ उसका नाम है   मजनू का टीला गुरुद्वारा साहिब, इसका  इतिहास  इसके नाम के साथ ही बहुत रोचक हैं जब मै यहाँ पहुचा तो मैंने देखा की यहां  का नज़ारा वाकी जगहों से काफी बदला बदला था  इस गुरूद्वारे के सामने एक पार्क हैं मैं इस पार्क मे  ज़्यदातर जाता हूँ मैं पार्क  मे जाकर बैठ गया और नज़ारे देखने लगा चारो-तरफ, पार्क मे बच्चे और बड़े सब थे और सब के सब खुश थे इन सब मे एक खास बात थी की यहाँ सब खुश थे किसी के भी चेहरे पर कोई सिकन ना थी सब के सब अपनी सारी समस्यायों को भूल गए थे  इन सब मे एक और खास   बात थी कि सब के सब इस समय मे जी रहे थे उन सब को देख के मेरे चहरे पर भी खुशी आ गयी और मैं  भी सब कुछ भूल गया, वाकई यह सब बहुत ख़ूबसूरत था


हम सब मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे क्यों जाते हैं हम खुशी के लिए ही तो जाते हैं वो  तो मुझे यही मिल गयी  थी यह यमुना नदी के किनारे   स्थि त  हैं इस गुरूद्वारे के साथ से यमुना नदी बहती है जिस  मैन गेट से गुरूद्वारे के अंदर घुसते हैं वहाँ से सीधा मैं आगे चला गया और यमुना नदी के किनारे पहुंच गया, जब मै वहाँ पंहुचा तो वहाँ बहुत शांति थी ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी शहर से बहुत दूर आ गया हूँ खुला आसमान था दूर तक प्रकृति का सौंदर्य था नदी के किनारे खेत था यह नज़ारा बहुत सुन्दर था यह सब ऐसा लग रहा थे मनो कोई फिल्म हो, लेकिन यह हकीकत थी आज का सफर यही खत्म  हो रहा है हर सफर के साथ आगे बढ़ता जा रहा हूँ और रोज कुछ नया सीखता जा रहा हूँ अभी सफर जारी है फिर मिलेंगे एक नए सफर के साथ | अलविदा |
खूबसूरत नज़ारा

                                     
पार्क मे बैठे लोग 


खेतो मे यमुना का पानी 


                                     
मजनू का टीला गुरुद्वारा साहिब|दिल्ली 









इस शहर मे शाम होते-होते बहुत कुछ बदल जाता हैं मैं  इस शहर की शाम को बड़ी करीब से देखना चाहता था इसी चाहत मे इस शहर की शाम को जानने निकल गया, सुना भी था इस शहर की शाम के बारे मे यह शहर रौशनी से नहा जाता हैं

 मैं इस शहर के एक नए पहलु से रूबरू होना चाहता था मैं घर से निकल गया इसी चाहत मे और सबसे पहले मैं पार्क मे जा पहुचा, पार्क मे अभी कम लोग थे सूर्य ढल रहा था उस ढलते सूर्य की तरफ किसी की निगाहें न थी सिर्फ मेरी निगाहें थी आकाश मे परिंदे गोता लगा रहे थे जैसे-जैसे  सूर्य ढल रहा था वैसे-वैसे परिंदे अपने घर लौट रहे थे ऐसा लग रहा था वे पुरे दिन काम करके आये हो,

कुछ देर बाद मेरे मन मे एक ख्याल आया आखिर ढलते सूर्य को कोई नमस्कार क्यों नहीं करता, कोई पूछता भी नहीं ढलते सूर्य को, जब सुबह सूर्य उदय होता तो हर कोई सूर्य नमस्कार करता है लेकिन ढलते सूर्य को कोई एक टक निहारता भी नहीं है शायद यही इस दुनिया का उसूल है उगते सूर्य को दुनिया सलाम करती है इससे  एक बात तो समझ आयी बनना है तो उगते सूर्य की तरह बनो बरना ढलते सूरज को तो कोई नहीं पूछता |


धीरे धीरे अब सूर्य अपने घर जा चूका था जो पार्क थोड़ा खाली सा था वो अब भर चूका था एक तरफ पार्को मे घूमते लोग, खेलते बच्चे, बतलाते लोग दूसरी तरफ पार्को मे लगा दीवानों का मेला, यह वो दीवाने थे जो ट्यूशन से सीधा अपनी महबूबा को लेकर पार्क आये थे यह इनका बचपन वाला प्यार था जिसमे इनके पास वक्त ही वक्त था 

पार्क से निकला तो देखा गलियो मे फ़ोन से चुपके लड़के और लड़कियाँ टहल रहे थे जिन्हे अपने आस पास का ध्यान तक नहीं था कि उनके पास क्या हो रहा है थोड़ा आगे बड़ा तो मंदिरो से आरती की  आवाज आ रही थी अँधेरा होने के बाद इस शहर मे गाड़िया और लोग कम लाइट ज्यादा नज़र आती हैं यमुना नदी की ऊपर बना पुल जिसकी रफ़्तार शाम होते ही थम जाती हैं दिन से ज्यादा इस शहर मे रात को हलचल होती है यह शहर(दिल्ली) सो कर भी नहीं सोता, दिन से ज्यादा इस शहर मे रात को लोग घूमना पसंद करते है यमुना के अंदर प्रतिबिंबिंत होता एक दूसरा शहर, इस शहर की शाम को  एक बार मे नहीं बताया जा सकता इस शहर मे शाम कई तरह से होती है


अभी कई राज वाकी हैं इस शहर  मे ||